जुलाई (कविताएँ)
०१. जल
स्मृतियों का जल भरा है
मेरी आँखों की सुराईयों में
यह जल टपकता रहता है
लगातार मेरी आँखों की देह से
भले ही यह टपके भी नहीं
तल से इसका रिसना कम नहीं होगा
देखते-देखते यह एक दिन जल जाएगा
रिस जाएगा तल से अकस्मात्
मौन चीत्कार के साथ
लेकिन बची रहेगी
छूटती पपड़ियों के साथ टूटती सी
सुराईयों की इसकी देह
सूख चुकी काई के बीच
रह जाएगा ताकता कोई निर्निमेष
मृत जल का उजला अवशेष
०२. आँधी
आँधी जब आती है
बदल जाता है धरती-आसमान का रंग
बदल जाती है पेड़-पौधों की आवाज़
उड़ जाता है सबके चेहरों का नूर
शरीर के साथ-साथ आत्मा तक
ज़मा हो जाती हैं ढेर सारी धूल
आँधी जब आती है
कर देती है बहुत कुछ इधर का उधर
आँधी में चला जाता है
अनवर का कोट राधा के आँगन में
फिर वहीं फँस कर रह जाता है
दीवार पर लगे तारों में
आँधी में ही चला जाता है
मोहन का रूमाल शबीना की छत पर
उलझ जाता है एंटीने में
आँधी में चला जाता है
कवि का मन कहीं दूर अपने प्रिय के पास
और ठहर जाता है आँधी थम जाने तक
जब वह वापस आता है
तब उसके साथ में आती है कविता
कविताएँ
कवि-मन में चलने वाली आँधी की बेटियाँ हैं
०३. जाना
वह चला गया
दुखी और उदास-सा
बिना मेरी तरफ देखे-मुस्कुराएं
वह दबे पांव चला गया
आ रही है पानी गिरने की आवाज़
स्नान घर से अनवरत
उसके कमरे का दरवाज़ा खुला है
रात का खाना मेज़ पर रखा है
बिस्तर बेतरतीब हैं
वह रात-भर पड़ा रहा पलंग पर
बिना बल्ब जलाए पंखा चलाए
हथेलियों में अपना मुँह छुपाए
कहीं कोई हलचल नहीं है
आज क्या हो गया ऐसा
कल बिल्कुल नहीं था जैसा
मुझे सिर्फ़ इस बात का मलाल है
एक लड़की आज पहली बार आने वाली थी
उससे मिलने और उसका घर देखने
जिसे वह बहुत प्रेम करता है
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