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जुलाई (कविताएँ)

०१. जल स्मृतियों का जल भरा है मेरी आँखों की सुराईयों में यह जल टपकता रहता है लगातार मेरी आँखों की देह से भले ही यह टपके भी नहीं तल से इसका रिसना कम नहीं होगा देखते-देखते यह एक दिन जल जाएगा रिस जाएगा तल से अकस्मात्  मौन चीत्कार के साथ लेकिन बची रहेगी  छूटती पपड़ियों के साथ टूटती सी सुराईयों की इसकी देह सूख चुकी काई के बीच  रह जाएगा ताकता कोई निर्निमेष मृत जल का उजला‌ अवशेष ०२. आँधी आँधी जब आती है बदल जाता है धरती-आसमान का रंग बदल जाती है पेड़-पौधों की आवाज़ उड़ जाता है सबके चेहरों का नूर शरीर के साथ-साथ आत्मा तक ज़मा हो जाती हैं ढेर सारी धूल  आँधी जब आती है कर देती है बहुत कुछ इधर का उधर आँधी में चला जाता है  अनवर का कोट राधा के आँगन में फिर वहीं फँस कर रह जाता है दीवार पर लगे तारों में आँधी में ही चला जाता है  मोहन का रूमाल शबीना की छत पर उलझ जाता है एंटीने में  आँधी में चला जाता है  कवि का मन कहीं दूर अपने प्रिय के पास और ठहर जाता है आँधी थम जाने तक जब वह वापस आता है तब उसके साथ में आती है कविता कविताएँ  कवि-मन में चलने वाली आँधी की बेटिय...

जून (कविताएँ)

०१. मनचाहा मिल गया है  जिसे महीनों से ढूँढ रहा था दिल का बहुत सादा है यह खुला रखता है दरीचा हमेशा  मेरी बाट जोहता हुआ  लंबी-चौड़ी बाँहें हैं इसकी बड़ा है दिल का दरवाज़ा  मगर यह तंग गलियों से होकर जाता है    कितनी शीतलता है इसके आगोश में कोई पूछे अगर मुझसे मैं नहीं बता पाऊँगा मेरे गले लगकर महसूस किया जा सकता है लेकिन यह फ़रिश्ता नहीं है  इसमें भी कुछ कमियाँ हैं जैसे होती है हरेक इंसान में  खटकती है जो मुझे रात-बेरात कभी-कभी   जो भी मुझसे मिलने आयेगा उसे देखकर यह मुस्कराएगा पानी पिलाएगा खाने की भी पूछेगा सिगरेट से कोई उज़्र नहीं इसे शराब भी पी जा सकती है इसको बुरा नहीं लगेगा कोई मेरे साथ दिन-भर बैठ सकता है मगर रात नहीं गुज़ार सकता  नहीं तो यह सोने नहीं देगा  मेरी पहली प्रेमिका की तरह है यह बिल्कुल  जिसको मेरे अलावा कोई बर्दाश्त नहीं था फ़िलहाल इसके दिल में ही है मेरा‌ घर  यह मेरा नया कमरा है जिसे इस शहर में इसी महीने लिया है  किराए पर नया कमरा/ विजय राही ०६/२०१४ ०३. दूध के दाँत नहीं उखड़े थे उसके चौदहवें साल तक भी घर की ...