संदेश

याद

 याद  सौंफ कट चुकी है मगर उसकी ख़ुशबू नहीं डंठलों में भी उतनी ही ख़ुशबू है जो अभी कुछ दिन और रहेगी हवाओं में तुम्हारे चले जाने पर भी तुम्हारी याद की ही तरह यह तपेगी जलेगी ढह पड़ेगी — विजय राही किताब प्राप्ति के लिए लिंक पर क्लिक करें- https://amzn.in/d/0eOCElNN

प्रेम, विवाह, उम्र, पद प्रतिष्ठा से जुड़ी हिन्दुस्तानी समाज की सोच पर सवाल

हिन्दुस्तानी समाज को आधुनिक और संवेदनशील होने में अभी बहुत वक्त लगेगा। बाड़मेर-जैसलमेर के पूर्व सांसद मानवेन्द्र सिंह जसोल ने अपनी पत्नी चित्रा सिंह को दो साल पहले एक दुखद सड़क हादसे में खो दिया था। इसी साल उन्होंने अपने बेटे कुंवर हमीर की शादी की है और हाल ही में आई ख़बरों के अनुसार मानवेन्द्र सिंह जसोल ने कथित तौर पर दूसरी शादी कर ली है। बताया जा रहा है कि वे उस महिला को सामाजिक और पारिवारिक स्वीकार्यता दिलाना चाहते हैं लेकिन इस अन्तरजातीय विवाह पर उन्हें घर-परिवार और सोशल मीडिया पर पद-प्रतिष्ठा और उम्र का हवाला देकर परेशान किया जा रहा है। घर वाले घर में नहीं घुसने दे रहे हैं और सोशल मीडिया पर तथाकथित समाज सुधारक ट्रोल कर रहे हैं। जबकि सबको यह सोचना चाहिए कि इंसान को हर उम्र में एक साथी की ज़रूरत महसूस होती है और शादी उसका निजी चुनाव है कि वह कब और किससे करता है। अगर वह अपनी शादी से ख़ुश हैं तो किसी को क्यों समस्या होनी चाहिए। मैं यह भी सोचता हूँ जब एक वर्चस्ववादी व्यक्ति के साथ ऐसा होता है तो किसी आम व्यक्ति को जीवन में ऐसा फैसला लेने में कितनी हिचक महसूस होगी।  —विजय राही ...

बुल्डोचर कल्चर

 उत्तरप्रदेश से 2017 में शुरू हुआ बुल्डोजर कल्चर अब पूरे देश में फ़ैल चुका है और त्वरित न्याय प्रणाली का एक हिस्सा या यूँ कहें कि एक प्रतीक बन गया है। क्या आपको नहीं लगता कि यह ग़लत है? किसी भी अपराध में कोई आरोपी पकड़ा जाता है तो अपराध सिद्ध होने के बाद उसको सज़ा होनी चाहिए लेकिन पूरे परिवार को रोड़ पर ले आना क्या अलोकतांत्रिक नहीं है? क्या इससे परिवार के बच्चे, महिलाएँ, बुज़ुर्ग और अन्य सदस्य मानसिक रूप से प्रताड़ित नहीं होंगे, जबकि उनका प्रत्यक्ष कोई कसूर भी नहीं है तो उनको सज़ा क्यों दी जा रही है। अगर आरोपी भविष्य में आरोप मुक्त होता है तो क्या प्रशासन दोबारा घर बनाकर देगा। हालाँकि इसमें भी ज़्यादातर मामलों में अवैध निर्माण का हवाला दिया जाता है, लेकिन क्या यह सब उसी वक्त याद आता है इससे पहले या बाद में क्या नगर निगम के अधिकारी सो जाते हैं ?

समसामयिक

बीबीसी हिन्दी ने लिखा कि ईरानी सरकारी टीवी के प्रेज़ेंटर ने रोते हुए ईरान के सुप्रीम लीडर ख़ामेनेई की मौत की घोषणा की और बताया देश में चालीस दिनों का शोक रहेगा। अभी हाल ही अमेरिका-इजराइल ने ईरान के कई शहरों पर हमले किए थे। अमेरिका-इजरायल के ईरान हमले में लगभग एक सौ साठ छात्राओं की मौत की ख़बर आई थी, तब से ही मन उदास था और बार-बार आलोक धन्वा की 'पतंग' कविता याद आ रही थी। फिर ईरान के सुप्रीम लीडर ख़मनोई की मौत ख़बर आई जिसकी आशंका पहले से ही थी। अपने मुल्क और अपने लोगों के लिए जान की बाजी लगा देने वाले, दुनिया-भर के मेरे प्रिय साहसी नेताओं में शामिल ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई को आख़िरी सलाम। जिस देश का शानदार सिनेमा देखते हुए सिनेमा देखना समझा हो, उस देश को साम्राज्यवादियों के हाथों इस तरह तबाह होते देखना बहुत पीड़ादायक है। मुझे उम्मीद ईरान हिम्मत नहीं हारेगा और इस सबसे जल्द उबरकर फिर मज़बूती के साथ खड़ा होगा।  दुआ है जल्द सब ठीक हो। ईरान ज़िन्दाबाद🍁

यात्रा-संस्मरण

  हम दरवेशों को कब रोना आता है - विजय राही ''जो चीज़ें घट चुकी हैं, स्मृति में वे जारी हैं। हमारा पूरा मानस स्मृति के सिवा कुछ नहीं है।''  -जे. कृष्णमूर्ति यात्राएँ और ख़ास तौर से साहित्यिक यात्राएँ मुझे हमेशा सुख देती हैं। यात्राओं से‌ किसी रचनाकार की रचनात्मकता ही नहीं निखरती बल्कि वह लोक के ज़्यादा क़रीब भी पहुँच पाता है। मैं अपने अतीत को याद करता हूँ तो मेरे लिए हिन्दी में साहित्यिक यात्रा का शुरुआती साल 2018 रहा। इससे पहले मैं उर्दू शायरी में काम कर रहा था‌ और अपने काम से काफ़ी हद तक‌ संतुष्ट था। इसके बावजूद मैं अपने इलाके के चर्चित कवि-कथाकारों में शुमार विनोद पदरज, प्रभात और चरणसिंह पथिक को तब तक‌ पढ़ चुका‌ था और प्रभावित भी था। दरअसल हुआ यूँ कि साल 2018 में राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ ने अध्यक्ष ऋतुराज के मार्गदर्शन में एक मुहिम चलाई, जिसका उद्देश्य था साहित्य को गाँवों-अंचलों तक ले जाया जाए, युवा प्रतिभाओं की खोज की जाए... आदि। किसी भी संगठन का एक उद्देश्य यह भी रहता है कि अपनी विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया जाए। इस मुहिम को नाम दिया गया- ‘अंचल सृजन यात्रा'। ...

सितंबर कविताएँ

झाड़ू पक्षियों के पास होती हैं पंख की झाड़ू पशुओं के पास होती हैं पूँछ की झाड़ू आसमानों की झाड़ू हैं बादल और धरती की झाड़ू हैं आँधियाँ कुदरत के पास कितनी ही  दृश्य और अदृश्य झाड़ू हैं काश मेरे पास भी होती कोई ऐसी झाड़ू  जिससे बुहार पाता अपनी आत्मा को -विजय राही  #GandhiJayanti२०१४

अगस्त (कविताएँ)

१. पुकार प्रेम की उम्र लंबी होती है  ऐसा मैंने सुना था  मैं भी तुम्हारे प्रेम में थी इसी प्रेमवश तुमसे मिलने आई तुम्हारे फूट चुके सर पे दुपट्टा बाँधा मैंने जो तुमने मुझे ओढ़ाया था  कुछ ही देर पहले बहुत चाव से    कितना अच्छा होता एक लाठी मेरे हिस्से भी आ जाती  मैं उसे फूल समझती कैसे मैंने तुम्हें अपने सीने से हटाया कैसे तुम्हें अपने बदन से दूर किया कैसे तुम्हें मैंने नए वस्त्र पहनाएं जो तुम मिलने के लिए पहनकर आए थे  फिर कैसे अपने आपको संभाल पाई और ज़ोर से चिल्लाई तुम्हें बचाने के लिए भी पुकारा मैंने उसी निष्ठुर दुनिया को जिस दुनिया से डरकर एक दिन  तुम्हारे पास चली आई थी ०२. एलर्जी  बचपन में खीर प्यारी थी उसे आँगन में बैठ थाली भरकर सुबड़ते हुए खाता था वह  लेकिन फिर अचानक छूट गई उसकी माँ कहती है  कोई बुरी नज़र ने देख लिया उसे इस तरह खाते हुए किसी की हाय लग गई  खीर नहीं खाने का तो उसकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा  गेहूँ का चारा बैलगाड़ियों में भरने से सोयाबीन का चारा ट्रकों में भरने से  टीबी ज़रूर हो गई उसे गाँव के लोग कहते...