सितंबर कविताएँ
झाड़ू पक्षियों के पास होती हैं पंख की झाड़ू पशुओं के पास होती हैं पूँछ की झाड़ू आसमानों की झाड़ू हैं बादल और धरती की झाड़ू हैं आँधियाँ कुदरत के पास कितनी ही दृश्य और अदृश्य झाड़ू हैं काश मेरे पास भी होती कोई ऐसी झाड़ू जिससे बुहार पाता अपनी आत्मा को -विजय राही #GandhiJayanti२०१४