अगस्त (कविताएँ)

१. पुकार

प्रेम की उम्र लंबी होती है 
ऐसा मैंने सुना था 
मैं भी तुम्हारे प्रेम में थी
इसी प्रेमवश तुमसे मिलने आई

तुम्हारे फूट चुके सर पे दुपट्टा बाँधा मैंने
जो तुमने मुझे ओढ़ाया था 
कुछ ही देर पहले बहुत चाव से 
 
कितना अच्छा होता
एक लाठी मेरे हिस्से भी आ जाती 
मैं उसे फूल समझती

कैसे मैंने तुम्हें अपने सीने से हटाया
कैसे तुम्हें अपने बदन से दूर किया
कैसे तुम्हें मैंने नए वस्त्र पहनाएं
जो तुम मिलने के लिए पहनकर आए थे
 फिर कैसे अपने आपको संभाल पाई
और ज़ोर से चिल्लाई

तुम्हें बचाने के लिए भी पुकारा मैंने
उसी निष्ठुर दुनिया को
जिस दुनिया से डरकर एक दिन 
तुम्हारे पास चली आई थी

०२. एलर्जी 

बचपन में खीर प्यारी थी उसे
आँगन में बैठ थाली भरकर
सुबड़ते हुए खाता था वह 
लेकिन फिर अचानक छूट गई

उसकी माँ कहती है 
कोई बुरी नज़र ने देख लिया उसे
इस तरह खाते हुए
किसी की हाय लग गई 

खीर नहीं खाने का तो
उसकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा 
गेहूँ का चारा बैलगाड़ियों में भरने से
सोयाबीन का चारा ट्रकों में भरने से 
टीबी ज़रूर हो गई उसे

गाँव के लोग कहते हैं 
उसके बाप को भी यही बीमारी थी
अब उसे धूल-मिट्टी और चारे से 
दूरी बनानी पड़ी 
जिनसे बचपन में गहरी दोस्ती थी 

लेकिन वह सोचता है
किसी दिन उसे कहीं
मनुष्यों सहित तमाम जीवों से 
एलर्जी न हो जाए
नहीं तो कहाँ जाएगा वह
कैसे बसर करेगा 
निपट अकेला इस संसार में


 ०३. दुःख 

हम एक दूसरे का मन समझते हैं

जब उससे बात करने वाला 
आस-पास कोई नहीं होता
वह मेरे घर झाड़ा-बुहारी करने लगता है


०४. संग-साथ

मुझे कोई अफ़सोस नहीं 
तुम क्यों चले गए

मैं नहीं चाहता‌
सागर में लहरें मेरे चाहने पर
उठें और गिरें
सूरज मेरे कहने पर
उगें और छिपें

फूल मेरे कहने पर खिलें
पत्ते मेरे कहने पर हिलें 
बसंत मेरे कहने पर
आएँ और जाएँ

इसलिए मैं कहता हूँ
मुझे बिल्कुल अफ़सोस नहीं
तुम क्यों आए और क्यों चले गए

क्योंकि इतना तो 
हमारा जीवन साथ है कि
तुम्हें अपना कह सकूँ
तुम्हारा जाना सह सकूँ


०५. अँधेरे का फूल

तुमको देखता हूँ
मुझे ऐसा लगता है 
जैसे अँधेरे में कोई फूल
खिल रहा‌ है

झर रही है ओस
तुम्हारी काँपती देह पर

मैं उसे आँखों से पी रहा हूँ


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद

माड़ कविताएँ