माड़ कविताएँ

विजय राही की माड़ कबिताएँ


०१.  थ्हारो ब्याव


तू कतरी भोळी छै बता 

खुद का ब्याव को नौतो देबा आगी


म्ह किस्या आऊंगो थ्हारा ब्याव म

कांई होबेगो जद तू मोकू देखेगी

ब्याव-बारात और लाड़ा कू तो भूल जाबेगी

म्हारी बाथ भर लेगी छाव-छाव म 


म्ह किस्या आऊंगो बता 

थ्हारा ब्याव म



०२. ऊपर पंखों चाले


ऊपर पंखों चाले

म्हारा सपना म

थ्हारी सुरता हाले 


ऊपर पंखों चाले

म्हारो मन करअ

भीतर आजा बेगी न्हार

लुगड़ी हटार बाळ बा ले


ऊपर पंखों चाले 

सुबह की काम लाग री छै तू

जतरे कांई थ्हारे बेई खाबा कू लियाऊं 

अतरे थोड़ो सो सांस ही खा ले


०३. याद


सौंफ कटरी छै

पण ऊकी बास कोनी 

फांसां म भी अतरी ही बास छै

हाल ताणी और थोड़ा-घणा दन रेबेगी

भ्याळ में 


थ्हारे गिया पाछै भी 

थ्हारी याद की नाऊं या 

तापेगी 

जळेगी

ढेह पड़ेगी



०४. थ्हारे बना


रामा म गायां चराबा

तू न जाबै छी 

म्ह भी कोनी जाबै छो

पपलाज का मेळा म

तू न जाबै छी  

म्ह भी कोन जाबै छो 

तू न कांई खाबै छी 

म्ह भी कोन खाबै छो


या सगळी बातां धिक जाबै छी 

ई बातां म तो घणो आणद आबै छो


पण ई बात पे म्हारो 

धम्मड़-कूटो हो जाबै छो

जद तू न नहाबै छी 

और म्हे भी कोनी नहाबै छो


०५. कलेवा 


दो दन भूखो-तिसायो रह्यो

एक-बारगी म्ह रूंसगो छो तोसू 


एक दन तो तोकू पतो कोनी चाल्यो

फेरूं दूसर'अ ही दन आर 

मोकू तून'अ दनाथ्या

थ्हारा हाथा सूं सीरो खुवायो

म्हारी आत्मा म परेम बुवायो 


०६. नतरकी


कतरो चोखो होबै

म्ह तोकू याद करूं अबार

और तू आ जाबै

नतरकी म्ह ओजूं जीबा सूं रूँस जाऊं


तू भी तो जाणे फेरूं 

तोने ही पडे़गो उल्टो  आबो

जद मत खीज्यो जाबा की

भूल जाज्यो फेरूं ओजू जाबो


०७. थ्हारी याद


थ्हारी मनमें आबै छै थ्हारे गिया पाछै

पण अब कोनी आबै

म्ह थ्हारे लारे-लारे 

अब थ्हारी मनमें कू भी 

याद करूं छूं


थ्हारी याद मुळकेगी

म्ह सोचतो रेहूं 

जद तू आबैगी


थ्हारी याद भी थारे पाछै-पाछै 

डिग लेगी

जद तू चल जाबैगी 


अब तू चलगी छै

कदे न आबा-आळी ठौर

थ्हारी याद आबे छै मोकू और


या ही म्हारी मौत छै

थ्हारी मनमें का हेरा लेर म्ह

खुद की मौत को भी लारे-लारे 

सोग मनाऊं छूं 



०८. रज्जी


ऊकू सब बावळी केअ छै

पण मोकू कदे भी

बावळी कोनी लागी बो


सगळा काम टेम टू टेम 

साफ-सफाई अछनाई सू रेबो

सार'अ दन लागी रे'अ छै

कोन लेबै घड़ी-सात भी सराव


जे बात ऊकू सही लागै

ऊपे मुळक जाबै छी

बरी बात कू आड़ा हाथ लेबै छी

ज़ोर सू चिंघाळती


ऊको खसम करतो कदे जोर-जबरदस्ती 

बा ऊकी भी पटाई कर देबै छी

पण फेरू कोनी सोबै छी सारी रात

रोबा लाग जाबै छी एकली पाटोड़ म 


गेला-घाटा म कोई कांई केअ दे कदे

ज़ोर सूं असी दकालती 

सामने आलो पाछे मूंडो बगाड़तो


ऊकी समझदारी ओज्यू दीखी 

मोकू गेला म आज

जद ऐक डोकरी ऊकी पोती के लारे

रामा म जारी छी

रज्जी पोती कू देख'अर मुळकी 

कणे कांई-कांई केहबा लागी


म्ह समझगो वा कांई के'ह री छै

"मांई या थ्हारी पोती छै

तोकू ही गई छै, घणी चोखी छै"


०९. तोकू पतो कोन 

तोकू पतो कोन

थ्हारे बना किस्या दन कटे छै किस्या रात

अब किस्या केहूं तोसू मलबा की बात


समझ ही को खाव

ऊंट कांई कलोट लेबैगो

कद मलबो होवगो कहां मलबो होवगो

थ्हारे लारे जैपुर घूमबा की मनमें आबै

पण थ्हारी पढ़ाई नीड़े छै म्हारी भी


असी बात कोन म्ह जैपुर म्हे न रह्यो 

रह्यो तो घणों पण घूम्यो कोन

कोई घूमबा की खेवे भी तो

म्ह हो जाबे छो मोन


पढ़बा आयो जद पढ्यो 

रंदबा आयो जद रंद् यो

म्ह अस्या भी सोचतो रह्यो

कदे कोई भाएली की लारे घूमेंगा


तोकू कांई पतो 

आपा दोनू सांचाई तो 

जाण कद घूमेंगा

पण मैं रोजीना सपनां म

थ्हारे लारे जैपर घूमतो रेहूं

कदे म्हारो उवार लागे 

जदे तोकू चूमतो रेहूं



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद

अगस्त (कविताएँ)