जून (कविताएँ)

०१.

मनचाहा मिल गया है 
जिसे महीनों से ढूँढ रहा था

दिल का बहुत सादा है यह
खुला रखता है दरीचा हमेशा 
मेरी बाट जोहता हुआ 
लंबी-चौड़ी बाँहें हैं इसकी
बड़ा है दिल का दरवाज़ा 
मगर यह तंग गलियों से होकर जाता है
  
कितनी शीतलता है इसके आगोश में
कोई पूछे अगर मुझसे मैं नहीं बता पाऊँगा
मेरे गले लगकर महसूस किया जा सकता है

लेकिन यह फ़रिश्ता नहीं है 
इसमें भी कुछ कमियाँ हैं
जैसे होती है हरेक इंसान में 
खटकती है जो मुझे रात-बेरात कभी-कभी
 
जो भी मुझसे मिलने आयेगा
उसे देखकर यह मुस्कराएगा
पानी पिलाएगा खाने की भी पूछेगा
सिगरेट से कोई उज़्र नहीं इसे
शराब भी पी जा सकती है
इसको बुरा नहीं लगेगा

कोई मेरे साथ दिन-भर बैठ सकता है
मगर रात नहीं गुज़ार सकता 
नहीं तो यह सोने नहीं देगा 
मेरी पहली प्रेमिका की तरह है यह बिल्कुल 
जिसको मेरे अलावा कोई बर्दाश्त नहीं था


फ़िलहाल इसके दिल में ही है मेरा‌ घर 
यह मेरा नया कमरा है
जिसे इस शहर में इसी महीने लिया है 
किराए पर

नया कमरा/ विजय राही
०६/२०१४


०३.

दूध के दाँत नहीं उखड़े थे उसके
चौदहवें साल तक भी
घर की कुछ औरतें शुभ और कुछ अशुभ बताती थी इसे

मगर उसकी माँ कहती- 
"सब सही है 
दूध के दाँत सफेद-झक्क हैं
उखड़ जाते अगर तो पीले उगते"

मर्दों को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी

और वह इन सबसे बेख़बर 
अपनी स्वप्नमयी दुनिया में कुदकड़े मार रहा था

दूध के दाँत/विजय राही
०६/१०२४


४.

वह बहुत कुछ करना चाहती थी
पहले पूरी पढ़ाई फिर अच्छी नौकरी
और मनपसंद शादी भी

चूंकि अब उसकी सगाई हो गई है
अब वह वही करेगी 
जो उसके होने वाले पति चाहेंगे 

अब पति के सपने उसके सपने हैं
क्योंकि वे कोई ग़ैर थोड़ी हैं 
उसके अपने हैं

सपने/ विजय राही 
०६/२०१४

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